उत्तराखंड राज्य आंदोलन से जुड़े हजारों लोगों के लिए राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। लंबे समय से अपने चिन्हीकरण और अधिकारों की प्रतीक्षा कर रहे उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों को अब राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अनुमोदन के बाद सरकार ने वर्ष 2021 तक लंबित पड़े राज्य आंदोलनकारियों के आवेदनों के निस्तारण की समयसीमा बढ़ाने का निर्णय लिया है। इस फैसले को राज्य आंदोलनकारियों के सम्मान और उनकी पहचान सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
उत्तराखंड राज्य का गठन लंबे और संघर्षपूर्ण आंदोलन के बाद हुआ था। इस आंदोलन में हजारों लोगों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया था। राज्य गठन के बाद विभिन्न चरणों में आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण की प्रक्रिया संचालित की गई, लेकिन कई पात्र लोगों के आवेदन विभिन्न कारणों से लंबित रह गए। अब सरकार द्वारा समयावधि बढ़ाए जाने से ऐसे आवेदकों को एक और अवसर मिलेगा और लंबित मामलों के समाधान का रास्ता साफ होगा।
मुख्यमंत्री के अनुमोदन के बाद जारी हुआ शासनादेश

राज्य सरकार की ओर से जारी शासनादेश के अनुसार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की स्वीकृति मिलने के बाद सचिव शैलेश बगोली ने संबंधित आदेश जारी कर दिए हैं। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि वर्ष 2021 तक जिलाधिकारी कार्यालयों में लंबित राज्य आंदोलनकारी चिन्हीकरण संबंधी आवेदनों के निस्तारण के लिए अतिरिक्त समय दिया जा रहा है।
सरकार का मानना है कि कई मामलों में दस्तावेजों की जांच, प्रमाणों का सत्यापन तथा अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण आवेदन लंबित रह गए थे। ऐसे में पात्र लोगों के साथ न्याय सुनिश्चित करने के लिए यह अवधि विस्तार आवश्यक था।
अब 24 सितंबर 2026 तक होगा निस्तारण
शासनादेश के अनुसार लंबित आवेदन पत्रों के निस्तारण की अवधि 24 जुलाई 2026 से बढ़ाकर 24 सितंबर 2026 तक निर्धारित की गई है। इसका अर्थ है कि संबंधित अधिकारियों को लंबित मामलों की समीक्षा, जांच और निर्णय लेने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा।
सरकार ने इस संबंध में आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए शासनादेश की प्रतियां सभी मंडलायुक्तों, जिलाधिकारियों और संबंधित विभागों को भेज दी हैं। प्रशासनिक स्तर पर भी अब लंबित फाइलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने की तैयारी शुरू होने की संभावना है।
राज्य आंदोलनकारियों के सम्मान को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल एक राजनीतिक अभियान नहीं था, बल्कि यह जनता के संघर्ष, बलिदान और समर्पण की ऐतिहासिक यात्रा थी। ऐसे में आंदोलन में योगदान देने वाले प्रत्येक वास्तविक आंदोलनकारी की पहचान और सम्मान सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार पात्र लोगों को पर्याप्त अवसर देने के साथ-साथ प्रक्रिया को अधिक सरल, पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। उनका कहना है कि किसी भी वास्तविक आंदोलनकारी को केवल तकनीकी कारणों या प्रक्रिया संबंधी विलंब के चलते वंचित नहीं रहने दिया जाएगा।
क्यों महत्वपूर्ण है राज्य आंदोलनकारी चिन्हीकरण
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के संघर्ष को औपचारिक मान्यता देने का माध्यम भी है जिन्होंने अलग राज्य की मांग को लेकर वर्षों तक आंदोलन किया।
चिन्हित राज्य आंदोलनकारियों को सरकार की विभिन्न योजनाओं और सुविधाओं का लाभ मिलता है। इसके अलावा यह सम्मान और पहचान का विषय भी है। इसलिए वर्षों से लंबित पड़े आवेदनों के निस्तारण को लेकर आंदोलनकारी संगठनों द्वारा समय-समय पर मांग उठाई जाती रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लंबित मामलों का पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से निपटारा किया जाता है तो इससे आंदोलनकारियों और सरकार के बीच विश्वास और मजबूत होगा। साथ ही राज्य निर्माण के इतिहास को संरक्षित करने की दिशा में भी यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
जिलाधिकारियों की भूमिका होगी अहम
अब इस पूरी प्रक्रिया में जिलाधिकारी कार्यालयों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। सभी लंबित आवेदनों की समीक्षा, दस्तावेजों का सत्यापन और पात्रता निर्धारण स्थानीय स्तर पर ही किया जाएगा।
सरकार द्वारा समयसीमा बढ़ाने के बाद प्रशासनिक अधिकारियों पर यह जिम्मेदारी भी बढ़ गई है कि वे निर्धारित अवधि के भीतर अधिकतम मामलों का निस्तारण सुनिश्चित करें। यदि यह प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से पूरी होती है तो वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे अनेक आवेदकों को राहत मिल सकती है।
आंदोलनकारी संगठनों की क्या है अपेक्षा
राज्य आंदोलनकारी संगठनों का लंबे समय से यह कहना रहा है कि कई वास्तविक आंदोलनकारी अब तक चिन्हीकरण प्रक्रिया से बाहर हैं। ऐसे में समयावधि विस्तार का निर्णय उनके लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
हालांकि संगठन यह भी चाहते हैं कि केवल समयसीमा बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि जांच और सत्यापन प्रक्रिया को भी अधिक पारदर्शी तथा संवेदनशील बनाया जाए ताकि किसी पात्र व्यक्ति के साथ अन्याय न हो और अपात्र लोगों को लाभ न मिल सके।
24 सितंबर 2026 तक जिलास्तर पर लंबित आवेदनों की जांच और निस्तारण की प्रक्रिया चलेगी। इसके बाद पात्र पाए गए आवेदकों को राज्य आंदोलनकारी के रूप में मान्यता देने की कार्रवाई आगे बढ़ेगी। सरकार का यह कदम राज्य आंदोलन के इतिहास से जुड़े उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो वर्षों से अपने योगदान की आधिकारिक पहचान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
धामी सरकार के इस निर्णय को उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों के सम्मान और अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि इस अवधि विस्तार का लाभ कितने लंबित आवेदनों के निस्तारण में मिल पाता है।
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