TMC में सबसे बड़ा सियासी विस्फोट? 80 में से 64 विधायक साथ होने का दावा, फ्लोर टेस्ट और चुनाव चिन्ह पर भी ठोकी दावेदारी

पश्चिम बंगाल की राजनीति में शनिवार को उस समय भूचाल आ गया जब Ritabrata Banerjee ने दावा किया कि उनके साथ अब All India Trinamool Congress (TMC) के 80 में से 64 विधायक हैं। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को समर्थक विधायकों की सूची सौंपने का दावा करते हुए फ्लोर टेस्ट कराने की मांग की है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि उनका गुट जल्द ही चुनाव आयोग से मिलकर पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर भी दावा पेश करेगा।

यह दावा ऐसे समय आया है जब बंगाल में TMC के भीतर पिछले कई दिनों से बगावत की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह दावा सही साबित होता है तो यह 1998 में पार्टी की स्थापना के बाद सबसे बड़ा संगठनात्मक संकट हो सकता है।

64 विधायकों का दावा, स्पीकर को सौंपी सूची

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रितब्रत बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जिस तरह लोकसभा में बागी सांसदों ने अपनी सूची स्पीकर को सौंपी थी, उसी तरह विधानसभा में भी बागी विधायकों ने अपने समर्थन की सूची अध्यक्ष को दे दी है। उन्होंने कहा कि यदि स्पीकर आवश्यक समझें तो फ्लोर टेस्ट कराया जाए और उनका गुट सदन में अपनी ताकत साबित करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

रिपोर्टों के अनुसार, कुछ दिन पहले तक उनके गुट के साथ 58 विधायक बताए जा रहे थे, लेकिन अब उन्होंने दावा किया है कि छह और विधायक उनके साथ जुड़ गए हैं, जिससे संख्या बढ़कर 64 हो गई है। उन्होंने यह संकेत भी दिया कि आने वाले दिनों में यह संख्या और बढ़ सकती है।

क्या TMC दो हिस्सों में बंट चुकी है?

पिछले सप्ताह पश्चिम बंगाल विधानसभा में बड़ा घटनाक्रम तब हुआ था जब 58 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व से अलग रुख अपनाते हुए रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुना था। विधानसभा अध्यक्ष ने भी उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी थी। इस कदम को TMC के इतिहास की पहली बड़ी औपचारिक टूट माना गया।

हालांकि दिलचस्प बात यह रही कि बागी गुट ने शुरू में Mamata Banerjee को पूरी तरह नकारने के बजाय उन्हें “मुख्य सलाहकार” की भूमिका निभाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव Abhishek Banerjee के नेतृत्व पर खुलकर सवाल उठाए गए।

चुनाव चिन्ह और पार्टी के नाम पर भी दावेदारी

अब यह विवाद केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रह गया है। रितब्रत बनर्जी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि उनका गुट जल्द ही चुनाव आयोग के समक्ष जाकर TMC के नाम और चुनाव चिन्ह पर दावा करेगा। यदि ऐसा होता है तो मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी का नहीं रहेगा बल्कि कानूनी और संवैधानिक लड़ाई में बदल सकता है।

भारतीय चुनावी राजनीति में किसी पार्टी के नाम और चिन्ह पर दावा तभी मजबूत माना जाता है जब किसी गुट के पास संगठन और निर्वाचित प्रतिनिधियों का बहुमत हो। ऐसे में 64 विधायकों के समर्थन का दावा इस लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बन गया है।

ममता बनर्जी के लिए क्यों बढ़ गई है चुनौती?

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TMC प्रमुख ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि हाल ही में पार्टी की एक बैठक में केवल 20 विधायक ही पहुंच पाए थे। उस समय पार्टी ने इसकी वजह अलग-अलग परिस्थितियों को बताया था, लेकिन विपक्ष और बागी गुट इसे पार्टी के भीतर बढ़ती असंतुष्टि का संकेत मान रहे हैं।

इसके अलावा पार्टी पहले ही रितब्रत बनर्जी और उनके सहयोगी विधायक को “पार्टी विरोधी गतिविधियों” के आरोप में निष्कासित कर चुकी है। इसके बावजूद उनका दावा है कि वास्तविक समर्थन उनके साथ है और विधानसभा में बहुमत का परीक्षण होने पर तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी।

आगे क्या होगा?

अब पूरे मामले की नजर तीन मोर्चों पर टिकी हुई है। पहला, क्या विधानसभा अध्यक्ष फ्लोर टेस्ट कराने का फैसला लेते हैं। दूसरा, क्या बागी गुट वास्तव में 64 विधायकों का समर्थन साबित कर पाता है। और तीसरा, यदि चुनाव आयोग तक मामला पहुंचता है तो पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर किस गुट की दावेदारी मजबूत साबित होती है।

TMC कांग्रेस विलय की चर्चा से बंगाल की राजनीति में भूचाल? एक हफ्ते में हो सकता है बड़ा फैसला

यदि रितब्रत बनर्जी अपने दावों को साबित करने में सफल रहते हैं, तो यह केवल TMC ही नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल की पूरी राजनीति का शक्ति संतुलन बदल सकता है। वहीं यदि दावे गलत साबित होते हैं, तो ममता बनर्जी का नेतृत्व और मजबूत होकर उभर सकता है। फिलहाल बंगाल की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां हर नया दिन नई हलचल लेकर आ सकता है।

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