डबल इंजन ने पकड़ी रफ्तार, ₹9,250 करोड़ के Kolkata-Varanasi Expressway को मिली मंजूरी

भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में एक और विशाल परियोजना तेजी से आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। Kolkata-Varanasi Expressway बहुप्रतीक्षित ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे को अब पर्यावरण मंत्रालय के एक्सपर्ट पैनल से बड़ी राहत मिल गई है। लगभग ₹9,250 करोड़ की लागत से बनने वाले इस एक्सप्रेसवे को एनवायरनमेंट क्लीयरेंस (EC) देने की सिफारिश कर दी गई है। यह परियोजना सिर्फ एक सड़क नहीं बल्कि पूर्वी भारत के आर्थिक और लॉजिस्टिक नेटवर्क को बदलने वाला कॉरिडोर मानी जा रही है। हालांकि इसके साथ पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण को लेकर गंभीर बहस भी तेज हो गई है क्योंकि यह एक्सप्रेसवे टाइगर लैंडस्केप और रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्रों से होकर गुज़रेगा।

235 किलोमीटर लंबा होगा नया ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे

Kolkata-Varanasi Expressway

नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी National Highways Authority of India द्वारा प्रस्तावित यह ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे लगभग 235 किलोमीटर लंबा होगा। परियोजना का मुख्य उद्देश्य कोलकाता और वाराणसी के बीच तेज और निर्बाध कनेक्टिविटी स्थापित करना है ताकि माल परिवहन, इंडस्ट्रियल मूवमेंट और पर्यटन को नई गति मिल सके। यह एक्सप्रेसवे चार से छह लेन का होगा और इसे आधुनिक एक्सेस-कंट्रोल्ड हाईवे के रूप में विकसित किया जाएगा।

सरकारी अधिकारियों के अनुसार इस परियोजना से ट्रैवल टाइम में भारी कमी आएगी और पूर्वी भारत में लॉजिस्टिक कॉस्ट कम करने में मदद मिलेगी। आने वाले वर्षों में यह कॉरिडोर औद्योगिक निवेश, वेयरहाउसिंग और फ्रेट मूवमेंट के लिए भी अहम भूमिका निभा सकता है।

किन जिलों से होकर गुज़रेगा एक्सप्रेसवे?

मीटिंग के मिनट्स के अनुसार यह परियोजना पश्चिम बंगाल के कई महत्वपूर्ण जिलों से होकर गुज़रेगी। इनमें पुरुलिया, बांकुरा, पश्चिम मेदिनीपुर, हुगली और हावड़ा जिले शामिल हैं। इन इलाकों में सड़क नेटवर्क के विस्तार से स्थानीय व्यापार और रोजगार को भी बढ़ावा मिलने की संभावना जताई जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कॉरिडोर पूर्वी भारत के कई पिछड़े और अर्ध-शहरी क्षेत्रों को मुख्य आर्थिक धारा से जोड़ सकता है। इसके जरिए कृषि उत्पादों और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बड़े बाजारों तक पहुंचने में आसानी होगी।

पर्यावरण पर बड़ा असर, 50 हजार पेड़ कटने की आशंका

इस परियोजना का सबसे विवादित पहलू पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर है। रिपोर्ट के मुताबिक नॉन-फॉरेस्ट एरिया में करीब 40,000 पेड़ काटे जाएंगे जबकि फॉरेस्ट एरिया में लगभग 10,000 पेड़ों की कटाई होगी। यानी कुल मिलाकर करीब 50 हजार पेड़ इस परियोजना की भेंट चढ़ सकते हैं।

इसके अलावा पश्चिम बंगाल में 103 हेक्टेयर से अधिक रिजर्व और प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट लैंड को डायवर्ट करने की आवश्यकता होगी। यही कारण है कि पर्यावरणविद और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े संगठन इस परियोजना को लेकर चिंता जता रहे हैं। उनका कहना है कि बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई जैव विविधता और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर सकती है।

टाइगर लैंडस्केप और हाथियों के कॉरिडोर से गुज़रेगा हाईवे

परियोजना का एक हिस्सा ऐसे क्षेत्र से होकर गुज़रेगा जिसे टाइगर लैंडस्केप माना जाता है। इसके साथ ही यह इलाका हाथियों की आवाजाही के लिए भी संवेदनशील माना जाता है। इसी चुनौती को देखते हुए NHAI ने हाथियों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही के लिए विशेष अंडरपास बनाने का प्रस्ताव दिया है।

रिपोर्ट के मुताबिक करीब 20 हाथी-कम-वाइल्डलाइफ अंडरपास बनाए जाएंगे जिनकी ऊंचाई 8 से 10 मीटर तक होगी। इन अंडरपास का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वन्यजीव बिना किसी बाधा के एक जंगल से दूसरे जंगल तक सुरक्षित तरीके से जा सकें।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन अंडरपास का सही तरीके से निर्माण और मॉनिटरिंग की गई तो सड़क दुर्घटनाओं में वन्यजीवों की मौत को काफी हद तक कम किया जा सकता है। हालांकि पर्यावरण कार्यकर्ताओं का यह भी तर्क है कि सिर्फ अंडरपास बना देने से पूरी समस्या का समाधान नहीं होगा और लंबे समय तक इकोलॉजिकल मॉनिटरिंग जरूरी होगी।

क्यों महत्वपूर्ण है यह एक्सप्रेसवे?

Kolkata-Varanasi Expressway approved

भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों में एक्सप्रेसवे नेटवर्क पर तेजी से काम कर रही है। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के बाद अब पूर्वी भारत में भी हाई-स्पीड कनेक्टिविटी पर जोर दिया जा रहा है।

कोलकाता-वाराणसी एक्सप्रेसवे को रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि यह पूर्वी बंदरगाहों और उत्तर भारत के व्यापारिक क्षेत्रों के बीच कनेक्टिविटी मजबूत करेगा। इससे माल ढुलाई तेज होगी और ट्रांसपोर्ट सेक्टर को बड़ा फायदा मिल सकता है।

इसके अलावा धार्मिक पर्यटन के लिहाज से भी यह परियोजना महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वाराणसी देश के सबसे बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों में शामिल है जबकि कोलकाता पूर्वी भारत का प्रमुख आर्थिक शहर है। दोनों शहरों के बीच बेहतर सड़क संपर्क से पर्यटन और व्यापार दोनों को लाभ मिलने की उम्मीद है।

पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन की चुनौती

Kolkata-Varanasi Expressway approved

यह परियोजना एक बार फिर उस बहस को सामने ले आई है जिसमें विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होती है। एक तरफ सरकार और इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंसियां इसे आर्थिक विकास और कनेक्टिविटी के लिए जरूरी बता रही हैं, वहीं दूसरी तरफ पर्यावरणविद जंगलों और वन्यजीवों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की परियोजनाओं में सिर्फ सड़क निर्माण ही नहीं बल्कि सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल को प्राथमिकता देनी होगी। अगर पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को गंभीरता से लागू किया गया तो यह परियोजना विकास और संरक्षण दोनों का संतुलित उदाहरण बन सकती है।

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क्या आगे बढ़ेगा प्रोजेक्ट?

एनवायरनमेंट एक्सपर्ट पैनल द्वारा क्लीयरेंस की सिफारिश मिलने के बाद अब परियोजना के अगले चरणों की प्रक्रिया तेज हो सकती है। हालांकि अंतिम मंजूरी और विभिन्न वन एवं पर्यावरणीय शर्तों का पालन अभी बाकी है। आने वाले महीनों में इस परियोजना को लेकर और विस्तृत चर्चाएं और मॉनिटरिंग देखने को मिल सकती है।

फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि यह एक्सप्रेसवे सिर्फ सड़क परियोजना नहीं बल्कि पूर्वी भारत के भविष्य की आर्थिक दिशा तय करने वाला बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन बन सकता है।

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