अमेरिकी विदेश विभाग की ताज़ा Country Report on Human Rights Practices ने भारत में जारी जातीय और उग्रवादी हिंसा को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं। रिपोर्ट में खास तौर पर मणिपुर की लंबी खिंच रही अशांति और छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियानों में हुई रिकॉर्ड मौतों पर गंभीर चिंता जताई गई है।
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👉 अभी ज्वाइन करें (Join Now)मणिपुर की सुलगती आग
मणिपुर में बहुसंख्यक मैतेई और अल्पसंख्यक कुकी समुदाय के बीच मई 2023 में शुरू हुआ जातीय टकराव 2024 तक खिंच गया। हालांकि जून 2023 के बाद हिंसा की तीव्रता कुछ घटी, लेकिन तनाव कम नहीं हुआ। 1 से 10 सितंबर के बीच ही कम से कम 10 लोग जातीय झड़पों में मारे गए।
10 सितंबर को छात्र प्रदर्शनों के बाद, सरकार की संकट सुलझाने में नाकामी को लेकर गुस्सा भड़क उठा और प्रशासन ने राज्य के कई हिस्सों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगा दिया।

आंकड़े जो हिला देते हैं
रिपोर्ट के अनुसार, संघर्ष की शुरुआत से अब तक 220 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है, जबकि करीब 67,000 लोग अपने घरों से बेघर हो चुके हैं। सितंबर तक राज्य में हालात काबू में रखने के लिए 198 कंपनियां केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की और 140 आर्मी कॉलम की तैनाती की गई थी।
छत्तीसगढ़ में नक्सल मोर्चा भी खून से लाल
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियानों के दौरान मौतों का आंकड़ा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच टकराव में बड़ी संख्या में हताहत हुए हैं, जिससे वहां भी हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं।
अमेरिकी चिंता, भारतीय चुनौती
अमेरिकी विदेश विभाग की यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत को न केवल सीमा पार से आने वाली सुरक्षा चुनौतियों का सामना है, बल्कि आंतरिक जातीय और उग्रवादी संघर्ष भी उसकी बड़ी चिंता बने हुए हैं। मणिपुर का मसला अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी चर्चा का विषय बन चुका है।
