धामी के उत्तराखंड में पाठशालाएं अब होंगी संस्कारशालाएं! श्रीराम-कृष्ण की वाणी से शिक्षा में सनातन मूल्यों की होगी वापसी

उत्तराखंड की पहाड़ियों में अब केवल प्रकृति की गूंज नहीं, बल्कि श्रीराम और श्रीकृष्ण की वाणी की गूंज भी सुनाई देगी। प्रदेश की धामी सरकार ने एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से क्रांतिकारी निर्णय लिया है: उत्तराखंड के स्कूलों के पाठ्यक्रम में अब रामायण की चौपाइयाँ और भगवद्गीता के श्लोक शामिल किए जाएंगे।

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यह फैसला केवल पाठ्यक्रम का बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा के मूल स्वभाव की वापसी के रूप में देखा जा रहा है।


📘 क्या होगा बदलाव में?

उत्तराखंड सरकार द्वारा लिए गए इस निर्णय के तहत:

  • कक्षा 6 से 12 तक के छात्रों को रामायण के नैतिक प्रसंग और भगवद्गीता के श्लोकों का अध्ययन कराया जाएगा।
  • ये पाठ्यक्रम नैतिक शिक्षा, मूल्य आधारित शिक्षा (Value Education) या वैकल्पिक पाठ्यक्रम के रूप में प्रारंभ में जोड़े जाएंगे।
  • श्लोकों के सरल अर्थ, आधुनिक जीवन से संबंध, और चरित्र निर्माण की दृष्टि से प्रस्तुति की जाएगी।

🗣️ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने क्या कहा?

मुख्यमंत्री ने इस फैसले की घोषणा करते हुए कहा:

“हमारा प्रयास है कि नई पीढ़ी केवल शिक्षित न हो, बल्कि संस्कारित भी हो। गीता और रामायण न किसी धर्म विशेष का ग्रंथ है, न किसी वर्ग की थाती – ये भारत की आत्मा हैं।”


🔥 राजनीतिक हलचल और प्रतिक्रिया

इस फैसले ने शिक्षा से लेकर राजनीति तक हर जगह बहस को जन्म दे दिया है।

समर्थकों का तर्क:

  • यह फैसला भारत की सांस्कृतिक विरासत से विद्यार्थियों को जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम है।
  • गीता और रामायण में दिए गए उपदेश आत्मबल, कर्म, नैतिकता और अनुशासन को बढ़ावा देते हैं।

विरोधियों की चिंता:

  • कुछ विपक्षी दलों और शिक्षाविदों ने इसे धर्मनिरपेक्षता पर चोट बताया है।
  • उनका कहना है कि सरकारी स्कूलों में किसी धर्म विशेष से जुड़ा पाठ्यक्रम लागू करना संविधान की भावना के विपरीत हो सकता है।

🧠 शिक्षाविदों का मत

शिक्षा विशेषज्ञों की राय भी इस पर बंटी हुई है। कुछ इसे चरित्र निर्माण का अवसर मानते हैं, जबकि कुछ का मानना है कि पाठ्यक्रम को तटस्थ और वैज्ञानिक सोच पर आधारित होना चाहिए।


🌟 क्यों खास है यह फैसला?

  • पहाड़ों में पहली बार इस स्तर पर पाठ्यक्रम में धार्मिक ग्रंथों को स्थान मिल रहा है।
  • उत्तराखंड चारधाम, ऋषि परंपरा और वेदभूमि होने के नाते इस निर्णय को सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में देखा जा रहा है।
  • यह बदलाव प्रधानमंत्री मोदी के “पंच प्राण” और “भारत की विरासत को आत्मगौरव से जोड़ने” के विजन के अनुरूप भी माना जा रहा है।

📌 क्या यह अन्य राज्यों के लिए उदाहरण बनेगा?

गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों में पहले ही गीता को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा चुका है। उत्तराखंड का यह निर्णय अब शेष भारत में भी एक सांस्कृतिक बहस को जन्म दे सकता है —
क्या शिक्षा केवल जानकारी का माध्यम होनी चाहिए, या संस्कारों का भी?


🕉️ अब शिक्षा का नया मंत्र:

अब सिर्फ पढ़ेगा भारत नहीं, संस्कार भी सीखेगा भारत।
उत्तराखंड के स्कूल अब केवल परीक्षा पास नहीं कराएंगे, बल्कि जीवन की परीक्षा के लिए भी तैयार करेंगे।

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