देवभूमि का सशक्त पहरेदार भाजपा की प्रयोगशाला का दमदार चेहरा: पुष्कर सिंह धामी

उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय से अस्थिरता और नेतृत्व परिवर्तन की मार झेलती रही है। एक दशक में चार से अधिक मुख्यमंत्री बदल चुके राज्य को जब जुलाई 2021 में पुष्कर सिंह धामी के रूप में अपना 11वां मुख्यमंत्री मिला, तो बहुतों को उम्मीद नहीं थी कि यह युवा चेहरा लंबे समय तक ठहर पाएगा। परंतु आज, जब हम उनके कार्यकाल का मूल्यांकन करते हैं, तो यह स्पष्ट है कि धामी न केवल स्थायित्व का प्रतीक बनकर उभरे हैं, बल्कि उन्होंने अपनी शैली से सत्ता और जनविश्वास के बीच एक मजबूत पुल भी निर्मित किया है।

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युवा चेहरा, सधी रणनीति

धामी की सबसे बड़ी ताकत रही है उनका “लो-प्रोफाइल, हाई-परफॉर्मेंस” वाला मॉडल। वे जनता से सीधे संवाद करने, जमीनी मुद्दों को प्राथमिकता देने और विवादों से दूर रहकर शासन चलाने की शैली अपनाते रहे। बतौर मुख्यमंत्री, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि भाजपा की केंद्रीय योजनाओं का क्रियान्वयन उत्तराखंड में तेज़ गति से हो। चाहे “एक जिला दो उत्पाद”, “होम स्टे योजना”, या “वास्तविक धार्मिक पर्यटन विकास”—उन्होंने पर्यटन, युवाओं और पलायन जैसे ज्वलंत मुद्दों पर फोकस किया।

“धामी डोज़” और धर्म की राजनीति

धामी की छवि एक ऐसे मुख्यमंत्री की बनी है जो दृढ़ फैसले लेने से नहीं हिचकते। “अवैध मदरसों की जांच”, “भूमाफियाओं पर बुलडोजर नीति”, “लव जिहाद और धर्मांतरण के खिलाफ सख्त कानून”, “यूसीसी पर पहल”—ये सभी निर्णय राज्य के राजनीतिक माहौल को नया आकार दे रहे हैं। हालांकि, विरोधी दल इसे धार्मिक ध्रुवीकरण की रणनीति बताते हैं, पर धामी इसे “संविधान और सनातन संस्कृति के संतुलन” का नाम देते हैं।

प्रशासनिक कार्यक्षमता और जनसरोकार

धामी सरकार ने डिजिटलीकरण, ई-गवर्नेंस, और शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्र में कई योजनाओं की शुरुआत की है। खास तौर पर “एंटी-चीटिंग लॉ” और “भर्ती घोटालों पर सख्त कार्रवाई” ने युवाओं में भरोसा बढ़ाया है। साथ ही “ऑपरेशन कालनेमि” जैसे अभियानों के ज़रिए फर्जी बाबाओं व अंधविश्वास के खिलाफ राज्य सरकार की सक्रियता स्पष्ट दिखी।

विपक्ष और चुनौतियाँ

धामी की सबसे बड़ी आलोचना यह रही है कि वे अपनी पार्टी की केंद्रीय नेतृत्व की ‘लाइन’ से बाहर नहीं जाते, जिससे उनका निर्णय स्वतंत्र नहीं बल्कि निर्देशित प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त, बेरोज़गारी, पर्वतीय क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, और राज्य के कर्ज़ का बढ़ता बोझ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर अभी भी ठोस सुधार अपेक्षित है। हाईप्रोफाइल चारधाम यात्रा प्रबंधन और जोशीमठ धंसाव जैसी घटनाओं ने शासन-प्रणाली की सीमाएँ भी उजागर की हैं।

पुष्कर सिंह धामी का कार्यकाल उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास में एक स्थायित्व और स्थिर शासन का अध्याय बनता दिख रहा है। उन्होंने न केवल अपनी पार्टी को एकजुट रखा, बल्कि अपनी उम्र और अनुभव की सीमाओं के बावजूद राज्य को एक स्पष्ट दिशा देने की कोशिश की है। आने वाले समय में यही देखा जाएगा कि क्या वे इन नीतियों को स्थायी विकास में परिवर्तित कर पाते हैं या यह कार्यकाल भी केवल एक “प्रतीकात्मक नेतृत्व” बनकर रह जाएगा।

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