✍🏻 सुमन शर्मा
“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” — हमने इस नारे को सड़कों से लेकर संसद तक गूंजते सुना। पर क्या कभी आपने सोचा है कि अब समय आ गया है ‘बेटा बचाओ’ कहने का भी? नहीं सोचा? तो चलिए, आज के भारत के आइने में आपको एक और चेहरा दिखाते हैं — वह बेटा, जो अब सिर्फ़ अपने परिवार की उम्मीद नहीं, बल्कि खुद अपने जीवन के लिए गुहार कर रहा है।
बीते 12 महीनों में हमारे देश ने कुछ ऐसे मामले देखे, जो आपको अंदर तक हिला देंगे।
यहाँ कोई “मजबूर बहू” नहीं, बल्कि हत्या का शिकार पति, आत्महत्या के कगार पर धकेला गया बेटा, और झूठे मामलों में फँसे पुरुष हैं।
👇 जरा इन घटनाओं पर नज़र डालिए:
1️⃣ मेरठ ड्रम मर्डर – मस्कान रस्तोगी ने प्रेमी संग मिलकर पति को मार ड्रम में भर दिया।
2️⃣ राजा रघुवंशी केस (मेघालय) – पत्नी सोनम और उसका प्रेमी, मिलकर पति की हत्या कर देते हैं। शव 300 फीट गहरी गॉर्ज में फेंका जाता है।
3️⃣ बेंगलुरु इंजीनियर अतुल सुभाष – पत्नी द्वारा झूठे केस और उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या।
4️⃣ TCS मैनेजर मनव शर्मा (आगरा) – वीडियो में आरोप: पत्नी निकिता का अफेयर और टॉर्चर।
5️⃣ प्रकाश शर्मा (जयपुर) – पत्नी चांचल और उसके प्रेमी ने मानसिक प्रताड़ना देकर पति को मरने को मजबूर किया।
6️⃣ हरिद्वार मर्डर केस – पत्नी रितु ने प्रेमी संग मिलकर पति का गला दबा दिया।
7️⃣ मैनपुरी कॉन्ट्रैक्ट किलिंग – विवाह के 15 दिन बाद पत्नी ने सुपारी देकर पति को मरवा डाला।
8️⃣ बांदा ट्रिपल ट्रेजडी – पत्नी की हत्या, फिर पति ने आत्महत्या, और बच्ची भूख से मरी।
9️⃣ आगरा ज़हरकांड – शादी के 3 दिन बाद ही पत्नी ने पति को ज़हर दे दिया।
🔟 मुंबई सुसाइड केस – सिद्धेश की आत्महत्या, वजह: पत्नी और उसका प्रेमी।
1️⃣1️⃣ राजकोट न्यायिक हत्या – पत्नी ने पति को इसलिए मार डाला क्योंकि उसे शक था कि वह बहरी बच्ची का शोषण कर रहा था।
जब पुरुष पीड़ित हो, तब चुप्पी क्यों?
इन घटनाओं में कुछ समानताएं हैं:
- अफेयर
- मानसिक उत्पीड़न
- फर्जी केस
- और एक ऐसा सिस्टम, जो पीड़ित पुरुष की आवाज़ नहीं सुनता
सोचिए, अगर यही घटनाएँ महिलाओं के साथ होतीं, तो पूरा मीडिया, सोशल मीडिया, एनजीओ, आयोग – सब गूंज उठते।
लेकिन जब बात पुरुषों की आती है – तो हम चुप क्यों हो जाते हैं? क्या इंसाफ का तराज़ू सिर्फ एक तरफ झुका रहेगा?
क्या कानून अब एक हथियार बन चुका है?
आज शादी संस्था नहीं, एक लीगल जुआ बन चुकी है – जिसमें अगर आपने “पति” का रोल ले लिया, तो आप संभावित अपराधी मान लिए जाते हैं।
IPC की धारा 498A, घरेलू हिंसा अधिनियम, मानसिक उत्पीड़न की शिकायतें — इन सबका दुरुपयोग एक सच्चाई है, और इसे नकारना स्वयं न्याय व्यवस्था का अपमान है।
अब वक्त आ गया है… ‘बेटा भी बचाओ’ कहने का
यह मत भूलिए, जो बेटा आत्महत्या करता है, वह किसी का भाई था, किसी का बेटा, और शायद किसी का बाप भी।
एक बेटे की मौत सिर्फ़ एक ज़िंदगी की नहीं, पूरे परिवार की कमर तोड़ देती है।
क्या हम तब तक चुप रहेंगे जब तक हर बेटे की मां हाथ जोड़कर कहने लगे –
“बेटी की रक्षा तो सिखाई, पर बेटा कहाँ जाए?”
🔴 अब समय है: न्याय का संतुलन मांगे।
अब समय है: झूठ के खिलाफ कड़े कानून लाने का।
अब समय है: #MenToo को सुनने और समझने का।
🧱 और हाँ, अगली बार जब “बेटी बचाओ” पढ़ें… तो ज़रा यह भी याद करें – “बेटा भी बचाओ।”