जनपद उत्तरकाशी के विकासखंड डुंडा के सुदूरवर्ती गांव सिंगोट में राज्य सरकार की स्वरोजगार नीतियों का जमीनी असर अब साफ दिखाई देने लगा है। पहाड़ी और सीमांत क्षेत्र होने के बावजूद यहां के ग्रामीणों ने परंपरागत पलायन की सोच को पीछे छोड़ते हुए स्थानीय संसाधनों के माध्यम से आजीविका का सशक्त मॉडल खड़ा किया है। यह पहल सीधे तौर पर पुष्कर सिंह धामी की स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों की सफलता को दर्शाती है।
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गांव के ग्रामीणों ने सहकारिता विभाग से जुड़कर श्री नागराजा मत्स्य जीवि उत्पादन सहकारी समिति का गठन किया, जो आज आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को पहाड़ों में साकार कर रही है। समिति के माध्यम से न केवल स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला है, बल्कि गांव की आर्थिक तस्वीर भी तेजी से बदल रही है।
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मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना से मिली मजबूती
समिति ने मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के अंतर्गत मत्स्य विभाग से कुल 44 लाख रुपये का ऋण प्राप्त किया, जिसमें 50 प्रतिशत की सब्सिडी प्रदान की गई। इस वित्तीय सहयोग ने परियोजना को शुरुआती मजबूती दी और ग्रामीणों का आत्मविश्वास बढ़ाया। वर्तमान में समिति से 34 सदस्य सीधे जुड़े हुए हैं, जबकि इसके अलावा 14 अन्य लोगों को भी अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है। यह आंकड़े पहाड़ी क्षेत्रों में सामूहिक उद्यम की संभावनाओं को मजबूती से सामने रखते हैं।
ट्राउट और स्थानीय मछली से सालाना लाखों का उत्पादन
स्थानीय आजीविका सृजन के उद्देश्य से समिति द्वारा गांव में ही 20 ट्राउट मछली टैंक और 6 स्थानीय मछली टैंक स्थापित किए गए हैं। इन टैंकों से प्रतिवर्ष 20 से 22 लाख रुपये तक का उत्पादन हो रहा है। ट्राउट मछली को 60 हजार रुपये प्रति क्विंटल की दर से बेचा जा रहा है, जबकि स्थानीय मछली की कीमत 300 रुपये प्रति किलो निर्धारित है। पहाड़ी जलवायु और स्वच्छ जल संसाधनों का यह व्यावसायिक उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर साबित हो रहा है।

आईटीबीपी को आपूर्ति, बीज उत्पादन में भी आत्मनिर्भरता
समिति द्वारा उत्पादित ट्राउट मछली की आपूर्ति मुख्य रूप से आईटीबीपी मातली को की जा रही है, जिससे बिक्री का स्थायी और भरोसेमंद बाजार उपलब्ध हुआ है। पहले मछली बीज की आपूर्ति विभाग द्वारा की जाती थी, लेकिन विभागीय प्रशिक्षण के बाद अब समिति स्वयं मछली बीज उत्पादन कर रही है। इतना ही नहीं, समिति अन्य उत्पादकों को भी 5 रुपये प्रति पीस की दर से बीज उपलब्ध करा रही है। यह कदम सहकारिता को केवल उत्पादक नहीं, बल्कि संसाधन प्रदाता के रूप में भी स्थापित कर रहा है।
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भविष्य की योजना: उत्पादन और आय में बड़ा लक्ष्य
समिति का अगला लक्ष्य उत्पादन बढ़ाकर 5 टन तक पहुंचाना और वार्षिक आय 30 लाख रुपये के स्तर को पार करना है। इसके लिए तकनीकी प्रशिक्षण, बाजार विस्तार और सहकारिता मॉडल को और मजबूत करने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। स्थानीय युवाओं में इस पहल को लेकर उत्साह है और अन्य गांवों के लोग भी इसे अपनाने की दिशा में रुचि दिखा रहे हैं।
पलायन रोकने की दिशा में प्रभावी पहल
सिंगोट गांव की यह सफलता कहानी यह साबित करती है कि सही नीति, वित्तीय सहयोग और प्रशिक्षण के साथ पहाड़ी क्षेत्रों में भी टिकाऊ रोजगार मॉडल विकसित किए जा सकते हैं। यह पहल राज्य सरकार की स्वरोजगार नीति और मुख्यमंत्री की दूरदर्शी सोच का व्यावहारिक उदाहरण है, जो ग्रामीण उत्तराखंड में आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक आजीविका की नई राह खोल रही है।