सुप्रीम कोर्ट का ‘घूसखोर पंडित’ पर बड़ा हंटर! नेटफ्लिक्स और मेकर्स को सख्त चेतावनी, धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ पर रोक

📍 नई दिल्ली | Eviralpress

देश की सबसे बड़ी अदालत ने ओटीटी कंटेंट की सीमाएं तय करते हुए एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप किया है। Supreme Court Ghooskhor Pandat Order के तहत सुप्रीम कोर्ट ने नेटफ्लिक्स की फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ को मौजूदा नाम के साथ रिलीज करने से रोक दिया है। अदालत ने मेकर्स को स्पष्ट निर्देश दिया है कि फिल्म का टाइटल तुरंत बदला जाए।

यह फैसला केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं है, बल्कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के लिए एक कड़ा संदेश माना जा रहा है कि रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी समुदाय की धार्मिक या सामाजिक पहचान को अपमानित नहीं किया जा सकता।

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Supreme Court Ghooskhor Pandat Order

⚖️ कोर्टरूम में क्या हुआ?

मामले की सुनवाई जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली बेंच कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने फिल्म के टाइटल पर गहरी नाराजगी जताई और कहा कि यह नाम प्रथम दृष्टया एक विशेष समुदाय को नकारात्मक और अपमानजनक रूप में दर्शाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नेटफ्लिक्स और फिल्ममेकर नीरज पांडे से ‘घूसखोर पंडित’ टाइटल पर सफाई मांगी और उनसे कहा कि वे कोर्ट को बताएं कि वे इसे नया नाम देने का प्रस्ताव कर रहे हैं, कोर्ट ने बिना लाग-लपेट के बात की. कोर्ट ने कहा कि ऐसे नाम अक्सर पब्लिसिटी के लिए चुने जाते हैं ताकि विवाद हो.  यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान आई, जब बेंच ने कुछ ही घंटों में साफ जवाब देने पर जोर दिया.

Supreme Court Ghooskhor Pandat Order में बेंच ने साफ किया कि ऐसे शब्दों का प्रयोग सार्वजनिक मंचों पर स्वीकार्य नहीं हो सकता।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी:

“हम यह अनुमति नहीं दे सकते कि किसी फिल्म के टाइटल या कंटेंट के जरिए समाज के किसी भी वर्ग को नीचा दिखाया जाए। यह अभिव्यक्ति की आजादी नहीं, बल्कि मर्यादा का उल्लंघन है।”


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🚫 सिर्फ नाम नहीं, कंटेंट भी रडार पर

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश केवल टाइटल बदलने तक सीमित नहीं है। Supreme Court Ghooskhor Pandat Order के अनुसार, मेकर्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि फिल्म के भीतर भी कोई दृश्य, संवाद या संदर्भ ऐसा न हो जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाए।

अदालत ने चेतावनी दी कि यदि रिलीज के बाद भी आपत्तिजनक सामग्री पाई गई, तो इसके कानूनी परिणाम गंभीर हो सकते हैं।


📺 नेटफ्लिक्स और ओटीटी इंडस्ट्री के लिए चेतावनी

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि Supreme Court Ghooskhor Pandat Order ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। अब तक डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट को लेकर जो ‘फ्री-हैंड’ रवैया देखने को मिलता था, उस पर अब न्यायिक निगरानी साफ दिखाई दे रही है।

इस फैसले से यह संकेत मिलता है कि:

  • क्रिएटिव लिबर्टी अब अनियंत्रित नहीं रहेगी
  • धार्मिक और जातिगत संदर्भों पर अतिरिक्त सावधानी जरूरी होगी
  • प्लेटफॉर्म्स को कंटेंट रिलीज से पहले लीगल रिस्क असेसमेंट करना होगा

🧠 सामाजिक सौहार्द सर्वोपरि

सुनवाई के दौरान अदालत ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि Social Harmony संविधान की मूल भावना है।
Supreme Court Ghooskhor Pandat Order में यह भी रेखांकित किया गया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है और उस पर संवैधानिक सीमाएं लागू होती हैं।

कोर्ट का मानना है कि मनोरंजन समाज को जोड़ने का माध्यम होना चाहिए, न कि विभाजन का।


🔮 आगे क्या होगा?

अब सबकी नजर इस बात पर है कि:

  • फिल्म का नया टाइटल क्या होगा
  • क्या मेकर्स कंटेंट में भी बदलाव करेंगे
  • और क्या यह फैसला अन्य विवादित ओटीटी प्रोजेक्ट्स पर भी असर डालेगा

विशेषज्ञ मानते हैं कि Supreme Court Ghooskhor Pandat Order भविष्य में ओटीटी सेंसरशिप और गाइडलाइंस को लेकर नई बहस को जन्म देगा।


यह फैसला बताता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स अब कानून से ऊपर नहीं हैं।
अगर कंटेंट समाज के किसी वर्ग को अपमानित करता है, तो अदालत हस्तक्षेप करेगी—चाहे माध्यम फिल्म हो, वेब सीरीज़ हो या ओटीटी।

‘घूसखोर पंडित’ मामला आने वाले समय में OTT कंटेंट रेगुलेशन का आधार बन सकता है।

 

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सुप्रीम कोर्ट की इमारत का दृश्य जो ओटीटी कंटेंट और ‘घूसखोर पंडित’ फिल्म पर आए न्यायिक आदेश को दर्शाता है।

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