अखबार: डिजिटल शोर के बीच युवा पीढ़ी का मार्गदर्शक – राजेन्द्र मोहन शर्मा

✍️ राजेन्द्र मोहन शर्मा
किशोर मनोविज्ञान विशेषज्ञ

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स्क्रीन की दुनिया में अखबार की वापसी

आज के दौर में जब नन्हीं उंगलियां किताबों के पन्ने पलटने के बजाय स्मार्टफोन की स्क्रीन पर स्क्रॉल करने की अभ्यस्त हो गई हैं,  उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्कूलों में अखबार पढ़ना अनिवार्य करने का निर्णय एक क्रांतिकारी कदम है। यह न केवल भाषाई सुधार की पहल है, बल्कि सूचनाओं के विस्फोट (Information Overload) के इस युग में बच्चों को सही और गलत के बीच भेद करना सिखाने का एक सशक्त माध्यम भी है।


ज्ञान का संवर्धन और भाषाई शुद्धता

सोशल मीडिया की ‘हिंग्लिश’ और शॉर्टकट वाली भाषा ने छात्रों की अपनी मातृभाषा और व्याकरण पर पकड़ कमजोर कर दी है। अखबार पढ़ने से—

  • शब्दकोश में वृद्धि: प्रतिदिन पाँच कठिन शब्दों के अर्थ सीखने से छात्रों की शब्दावली समृद्ध होती है।
  • सटीक अभिव्यक्ति: संपादकीय लेखों को पढ़ने से बच्चों में तार्किक रूप से अपनी बात रखने की कला विकसित होती है।
  • सामान्य ज्ञान: राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं से सीधा जुड़ाव उन्हें वैश्विक नागरिक बनाता है।

 स्क्रीन टाइम पर अंकुश और मानसिक स्वास्थ्य

आंकड़े बताते हैं कि भारत में 5 वर्ष तक के बच्चे भी प्रतिदिन 2 घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिता रहे हैं। अखबार एक डिजिटल डिटॉक्स की तरह काम करता है। यह एकाग्रता बढ़ाता है और आंखों पर पड़ने वाले तनाव को कम करता है।

जहाँ सोशल मीडिया की एल्गोरिदम बच्चों को उनकी पसंद की ही चीजें दिखाती है, वहीं अखबार उन्हें उन विषयों से भी परिचित कराता है जिनके बारे में उन्होंने पहले कभी नहीं सोचा था।

अखबार केवल सूचना नहीं देते, वे संवेदनाएं भी जगाते हैं - राजेंद्र मोहन शर्मा

भ्रामक सूचनाओं (Fake News) के खिलाफ ढाल

इंटरनेट पर सूचनाओं का अंबार है, लेकिन उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध है। समाचार पत्र एक संपादकीय प्रक्रिया से गुजरते हैं, जहाँ हर तथ्य की जांच होती है।

जब बच्चे अखबार पढ़ते हैं, तो वे प्रामाणिक जानकारी और राय (Opinion) के बीच का अंतर समझते हैं। यह उनमें तुलनात्मक सोच (Critical Thinking) विकसित करता है, जिससे वे भविष्य में भ्रामक विज्ञापनों और प्रोपेगेंडा का शिकार होने से बचते हैं।

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व्यक्तित्व का निर्माण और सामाजिक सरोकार

अखबार केवल सूचना नहीं देते, वे संवेदनाएं भी जगाते हैं। सामाजिक बदलाव की कहानियां और मानवीय सरोकार के समाचार बच्चों में सहानुभूति और उत्तरदायित्व की भावना पैदा करते हैं।

वे समय से पहले वयस्क बनाने वाली ‘सोशल मीडिया संस्कृति’ से बचकर अपनी उम्र के अनुसार स्वस्थ बौद्धिक विकास कर पाते हैं।

अखबार: डिजिटल शोर के बीच युवा पीढ़ी का नया जीवनदान

उत्तर प्रदेश सरकार का यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि सूचनाओं के विस्फोट (Information Overload) के युग में बच्चों को विवेकशील बनाने का एक सशक्त अनुष्ठान है।

ज्ञान का संवर्धन और भाषाई शुद्धता (वैज्ञानिक दृष्टि)

सोशल मीडिया की शॉर्टकट भाषा से आई गिरावट को रोकने में अखबार ‘संजीवनी’ का काम करते हैं। संपादकीय लेखों के माध्यम से छात्रों में तार्किक अभिव्यक्ति विकसित होती है, जो भविष्य में उनके पेशेवर करियर की नींव बनती है।

वैज्ञानिक प्रभाव: क्यों अखबार स्क्रीन से बेहतर है?

  • मस्तिष्क का व्यायाम: स्क्रीन पर पढ़ना ‘स्कैनिंग’ है, जबकि अखबार ‘डीप रीडिंग’ को बढ़ावा देता है।
  • नागरिक चेतना: अखबार पढ़ने वाले बच्चों में मतदान और सामाजिक भागीदारी की संभावना 40% अधिक पाई गई है।
  • शैक्षणिक लाभ: ‘न्यूज़पेपर इन एजुकेशन’ कार्यक्रम से रीडिंग स्कोर में 10%–30% तक सुधार।
  • करियर में बढ़त: UPSC, बैंकिंग जैसी परीक्षाओं में समसामयिकी पर मजबूत पकड़।

भारत और दुनिया से सीख: सफल उदाहरण

🇮🇳 भारत

  • केरल – ‘अक्षर मुथम्’: ग्रामीण क्षेत्रों में भाषाई दक्षता राष्ट्रीय औसत से ऊपर।
  • राजस्थान – ‘पत्रिका इन एजुकेशन’: रचनात्मकता और विश्लेषण क्षमता में वृद्धि।
  • महाराष्ट्र – ‘सकाल स्कूल अभियान’: अखबार चर्चा से विचारशील छात्र।

🌍 वैश्विक

  • अमेरिका – NIE कार्यक्रम
  • नॉर्वे व फिनलैंड – मीडिया साक्षरता मॉडल

भ्रामक सूचनाओं के खिलाफ सुरक्षा कवच

अखबार बच्चों को तथ्य और सतही ज्ञान में अंतर करना सिखाते हैं। यही क्षमता उन्हें भविष्य में सोशल मीडिया प्रोपेगेंडा से बचाती है।


‘अखबार मित्र क्लब’: एक नई पहल

कई स्कूलों में—

  • छात्र संपादक बनते हैं
  • शब्द खोज और मुहावरे सीखते हैं
  • कार्टून विश्लेषण से राजनीति व समाज समझते हैं

अखबार—एक सरल, सशक्त समाधान

स्क्रीन टाइम की लत से निजात पाने का सबसे सरल, विकसित और सुगम उपाय है—अखबार
खुद भी पढ़ें और बच्चों को भी पढ़ाएं। यही एक जागरूक, विवेकशील और सशक्त पीढ़ी की नींव है।

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