भारत के लिए एक चिंताजनक खबर सामने आई है। देश का स्वदेशी सैटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम NavIC फिलहाल तकनीकी रूप से काम करना बंद कर चुका है।
13 मार्च 2026 को इस सिस्टम में सक्रिय सैटेलाइट्स की संख्या घटकर केवल 3 रह गई, जबकि किसी भी नेविगेशन सिस्टम को सही तरीके से काम करने के लिए कम से कम 4 सैटेलाइट्स का सक्रिय होना जरूरी होता है।
इस स्थिति के कारण भारत का पूरा NavIC कॉन्स्टेलेशन फिलहाल डिफंक्ट (Defunct) माना जा रहा है।
यह वही सिस्टम है जिसे भारत ने विदेशी नेविगेशन सिस्टम पर निर्भरता कम करने और सैन्य तथा नागरिक उपयोग के लिए तैयार किया था।
NavIC क्या है और क्यों बनाया गया था
NavIC का पूरा नाम है Navigation with Indian Constellation।
यह भारत का स्वदेशी सैटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम है जिसे Indian Space Research Organisation ने विकसित किया था।
यह सिस्टम मुख्य रूप से भारत और उसके आसपास लगभग 1500 किलोमीटर क्षेत्र में सटीक लोकेशन और टाइमिंग डेटा प्रदान करता है।
NavIC के उपयोग
- सैन्य नेविगेशन
- समुद्री और हवाई परिवहन
- आपदा प्रबंधन
- मोबाइल और वाहन नेविगेशन
- मछुआरों के लिए समुद्री मार्गदर्शन
भारत के लिए यह सिस्टम रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
1999 कारगिल युद्ध से शुरू हुई NavIC की कहानी
NavIC की शुरुआत के पीछे एक ऐतिहासिक घटना जुड़ी है।
1999 के Kargil War के दौरान भारत को अमेरिका के GPS सिस्टम की जरूरत पड़ी थी।
लेकिन उस समय अमेरिका ने भारतीय सेना को GPS डेटा उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया।
इस घटना ने भारत को यह समझा दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए विदेशी नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है।
इसी के बाद भारत ने अपना स्वतंत्र नेविगेशन सिस्टम विकसित करने का निर्णय लिया।
NavIC के पहले सैटेलाइट की लॉन्चिंग
NavIC प्रोजेक्ट का पहला सैटेलाइट IRNSS‑1A वर्ष 2013 में लॉन्च किया गया था।
इसके बाद 2013 से 2018 के बीच कुल 9 सैटेलाइट लॉन्च किए गए।
इनमें शामिल थे:
- IRNSS-1A
- IRNSS-1B
- IRNSS-1C
- IRNSS-1D
- IRNSS-1E
- IRNSS-1F
- IRNSS-1G
- IRNSS-1H
- IRNSS-1I
हालांकि इनमें से IRNSS-1H लॉन्च के दौरान ही असफल हो गया था क्योंकि रॉकेट का पेलोड फेयरिंग अलग नहीं हो पाया।
Rubidium Atomic Clock: सिस्टम की सबसे बड़ी कमजोरी
नेविगेशन सैटेलाइट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है एटॉमिक क्लॉक।
NavIC के पहले सैटेलाइट्स में Rubidium Atomic Clocks लगाए गए थे जो स्विट्जरलैंड की कंपनी SpectraTime से खरीदे गए थे।
लेकिन 2016 के आसपास इन घड़ियों में बड़ी तकनीकी समस्या सामने आई।
क्या हुआ
- कई सैटेलाइट्स की एटॉमिक क्लॉक अचानक फेल होने लगी
- कुछ ही समय में 5 NavIC सैटेलाइट पूरी तरह निष्क्रिय हो गए
- बिना एटॉमिक क्लॉक के सैटेलाइट लोकेशन और टाइमिंग डेटा नहीं दे सकता
यही NavIC सिस्टम के कमजोर होने की शुरुआत थी।
दूसरी पीढ़ी के सैटेलाइट का प्रयास
इन समस्याओं से सबक लेते हुए ISRO ने NavIC की दूसरी पीढ़ी विकसित करने का फैसला किया।
इसमें भारतीय वैज्ञानिकों ने स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक तैयार की।
इस नई पीढ़ी का पहला सैटेलाइट NVS‑01 वर्ष 2023 में सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया।
उस समय NavIC सिस्टम में सक्रिय सैटेलाइट थे:
- IRNSS-1B
- IRNSS-1F
- IRNSS-1I
- NVS-01
यानी कुल 4 सक्रिय सैटेलाइट, जो सिस्टम के न्यूनतम संचालन के लिए जरूरी थे।
IRNSS-1F बना सिस्टम की सबसे कमजोर कड़ी
इन चार सैटेलाइट में से IRNSS‑1F की स्थिति पहले से ही खराब थी।
इसमें लगी तीन एटॉमिक क्लॉक में से:
- दो पहले ही फेल हो चुकी थीं
- केवल एक क्लॉक काम कर रही थी
अगर यह आखिरी क्लॉक भी फेल होती तो NavIC सिस्टम का संतुलन बिगड़ना तय था।
NVS-02 मिशन भी असफल रहा
सिस्टम को बचाने के लिए ISRO ने NVS‑02 लॉन्च किया।
इसे GSLV‑F15 रॉकेट से लॉन्च किया गया।
लेकिन लॉन्च के बाद एक बड़ी तकनीकी समस्या सामने आई।
क्या हुआ
- सैटेलाइट का मुख्य थ्रस्टर ठीक से काम नहीं कर पाया
- एक pyro channel valve failure हुआ
- सैटेलाइट अपने लक्ष्य Geostationary Orbit तक नहीं पहुंच पाया
बाद में जांच में पता चला कि थ्रस्टर वाल्व के कनेक्टर के कई पिन डिस्कनेक्ट हो गए थे।
PSLV रॉकेट की लगातार असफलताएँ
इसी दौरान ISRO के वर्कहॉर्स रॉकेट PSLV में भी तकनीकी समस्याएँ सामने आईं।
लगातार कुछ असफल लॉन्च के बाद ISRO ने 3 महीनों के लिए सभी रॉकेट लॉन्च रोक दिए।
इस वजह से NavIC के लिए नया सैटेलाइट लॉन्च करना संभव नहीं हो पाया।
13 मार्च 2026: जब पूरी प्रणाली ठप हो गई
आखिरकार वही हुआ जिसका डर था।
13 मार्च 2026 को IRNSS-1F की आखिरी एटॉमिक क्लॉक भी फेल हो गई।
इसके बाद:
- सैटेलाइट ने नेविगेशन सेवा देना बंद कर दिया
- सक्रिय सैटेलाइट की संख्या 4 से घटकर 3 रह गई
और इसी के साथ पूरा NavIC सिस्टम तकनीकी रूप से ठप हो गया।
इसका भारत पर क्या असर पड़ेगा
हालांकि NavIC का इस्तेमाल अभी सीमित स्तर पर होता था, लेकिन इसका महत्व काफी बड़ा है।
संभावित प्रभाव
- सैन्य नेविगेशन सिस्टम प्रभावित हो सकता है
- समुद्री और आपदा प्रबंधन सेवाओं में दिक्कत
- NavIC आधारित मोबाइल सेवाएं प्रभावित
हालांकि फिलहाल भारत GPS और अन्य अंतरराष्ट्रीय नेविगेशन सिस्टम का उपयोग कर सकता है।
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ISRO के सामने अब क्या चुनौती है
अब सबसे बड़ी चुनौती NavIC सिस्टम को जल्द से जल्द पुनर्जीवित करना है।
विशेषज्ञों के अनुसार इसके लिए जरूरी होगा:
- नए NVS सैटेलाइट लॉन्च करना
- स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक को स्थिर बनाना
- लॉन्च वाहन की तकनीकी समस्याएं दूर करना
अगर आने वाले महीनों में नए सैटेलाइट लॉन्च होते हैं तो NavIC सिस्टम को दोबारा सक्रिय किया जा सकता है।
NavIC भारत के लिए केवल एक नेविगेशन सिस्टम नहीं बल्कि रणनीतिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।
लेकिन एटॉमिक क्लॉक फेलियर, असफल लॉन्च और तकनीकी चुनौतियों के कारण फिलहाल यह सिस्टम बंद हो गया है।
अब पूरी नजर ISRO पर है कि वह कितनी जल्दी नए सैटेलाइट लॉन्च करके इस महत्वपूर्ण परियोजना को फिर से सक्रिय करता है।
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