धार्मिक प्रवचन कर रहे प्रेमानंद महाराज का एक बयान इन दिनों देशभर में तीखी बहस और विरोध का कारण बन गया है। महाराज ने कहा कि –
“आज के समय में 100 में से सिर्फ 2 से 4 लड़कियां ही पवित्र होती हैं।”
सबसे पहले और सटीक खबरें पाने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें
👉 अभी ज्वाइन करें (Join Now)इस कथन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद राजनीतिक, सामाजिक और महिला संगठनों ने इसे स्त्री विरोधी और घोर अपमानजनक बताया।
💥 क्या कहा महाराज ने?
उत्तर प्रदेश के वृंदावन में दिए गए अपने प्रवचन में प्रेमानंद महाराज ने कहा:
“अगर कोई युवक चार लड़कियों से संबंध रखता है, तो शादी के बाद भी वह पत्नी के साथ ईमानदार नहीं रहेगा।
और यदि कोई लड़की चार पुरुषों के साथ रही है, तो वह पति को स्वीकार ही नहीं कर पाएगी।
आज की तारीख में सिर्फ 2 से 4 लड़कियां ही पवित्र बची हैं।”
इस ‘पवित्रता’ की परिभाषा को लेकर उन्होंने स्पष्ट किया कि वह उस लड़की को पवित्र मानते हैं जो सिर्फ एक ही पुरुष के प्रति समर्पित हो।
📱 सोशल मीडिया पर भड़का जनाक्रोश
बयान सामने आते ही ट्विटर (X), इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। कई यूज़र्स ने इसे महिलाओं की गरिमा का सीधा अपमान बताया।
- “ये संत नहीं, महिलाओं के सम्मान के दुश्मन हैं।”
- “आप जैसे लोग सनातन धर्म की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं।”
- “क्या पवित्रता का पैमाना सिर्फ महिलाओं पर लागू होगा?”
🔍 तुलना अनिरुद्धाचार्य विवाद से
कई नेटिज़न्स ने प्रेमानंद महाराज की तुलना हालिया अनिरुद्धाचार्य से की, जिन्होंने महिलाओं के पहनावे को लेकर विवादित टिप्पणी की थी।
इससे पहले भी धर्म के मंचों से महिलाओं के खिलाफ ऐसे बयान आते रहे हैं जो समाज में लिंगभेद और रूढ़िवादिता को बढ़ावा देते हैं।
🧠 समाजशास्त्रियों और महिला संगठनों की प्रतिक्रिया
- महिला अधिकार संगठनों ने कहा:
“ऐसे बयान हमारे संघर्ष को पीछे धकेलते हैं। धर्म के नाम पर यह लांछन बर्दाश्त नहीं।” - सामाजिक चिंतकों ने चेताया:
“जब एक धार्मिक चेहरा महिलाओं को इस तरह आंकने लगे, तो यह सामाजिक विषमता और स्त्रीद्वेष को संस्थागत रूप देने जैसा है।”
📜 समर्थकों का बचाव
वहीं प्रेमानंद महाराज के कुछ अनुयायियों का कहना है कि महाराज समाज को एक नैतिक संदेश देना चाहते थे, जिसे मीडिया ने तोड़-मरोड़ कर पेश किया।
उनके मुताबिक यह बयान युवाओं को संयमित और मर्यादित जीवन जीने की प्रेरणा देने के लिए था, न कि किसी का अपमान।
