उत्तराखंड में दो बार जीते निर्दलीय प्रत्याशी लोकसभा चुनाव, जानें कब, कौन और कहां से उतरा था मैदान में

उत्तराखंड में इस बार कई सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी ताल ठोक रहे हैं। निर्दलीय प्रत्याशियों के मैदान में उतरने से इस बार प्रदेश की तीन सीटों पर जबरदस्त मुकाबला देखने को मिल रहा है। यूं तो उत्तराखंड में निर्दलीय प्रत्याशियों में उत्तराखंड की जनता की कोई खासी दिलचस्पी नहीं रही है। इतिहास गवाह है कि उत्तराखंड में लोकसभा चुनाव के दौरान लोगों की दिलचस्पी राष्ट्रीय दलों के प्रति ज्यादा दिखाई दी है। लेकिन उत्तराखंड में ऐसे भी लोकसभा चुनाव हुए जिसमें निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत हासिल की थी।

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उत्तराखंड में लोस चुनाव दो बार जीते निर्दलीय प्रत्याशी

उत्तराखंड में लोगों की दिलचस्पी ज्यादा राष्ट्रीय दलों के प्रति देखने को मिलती है। लेकिन अगर एक नजर प्रदेश के चुनावी इतिहास पर डाली जाए तो राज्य के इतिहास में दो ऐसे राजनीतिक सुरमा भी हुए हैं जिन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा था और जीत भी हासिल की। दो ऐसे निर्दलीय प्रत्याशी जिन्होंने मिथक तोड़ते हुए उत्तराखंड में जीत हासिल की।

1952 में महारानी कामलेंदुमती शाह ने ठोकी थी निर्दलीय ताल

उत्तराखंड के लोकसभा चुनाव के इतिहास पर नजर डालें तो श की आजादी के बाद पहले ही आम चुनाव में साल 1952 में टिहरी की महारानी कामलेंदुमती शाह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरी। उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी को करारी हार दी थी। इसके साथ ही टिहरी सीट पर राज परिवार के दबदबे को उन्होंने साबित कर दिया। उनके बाद इस सीट से राष्ट्रीय दलों के टिकट से राज परिवार ही चुनाव जीतता हुआ आ रहा है। टिहरी लोकसभा सीट पर 19 बार चुनाव हुए जिसमें से 11 बार जनता ने राज परिवार को ही जिताया है।

पौड़ी में निर्दलीय प्रत्याशी बहुगुणा को मिली थी जीत

सिर्फ महारानी कामलेंदुमती शाह ही नहीं पौड़ी सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी हेमवती नंनद बहुगुणा को भी जीत मिली थी। साल 1982 में एचएन बहुगुणा निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे। इस चुनाव के जैसा चुनाव शायद ही उत्तराखंड के चुनावी इतिहास में कभी हुआ हो। जब एक निर्दलीय प्रत्याशी को हराने के लिए इंदिरा के साथ ही कांग्रेस ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था।

बेहद दिलचस्प था 1982 के उपचुनाव

1982 के उपचुनाव को उत्तराखंड के चुनावी इतिहास में सबसे दिलचस्प चुनाव माना जाता है। ये वो चुनाव था जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुईं थी। गढ़वाल सांसद हेमवती नंदन बहुगुणा ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर पार्टी के साथ ही अपनी संसद की सदस्यता भी छोड़ दी। जिसके बाद पौड़ी में उपचुनाव कराया गया।

उपचुनाव में बहुगुणा निर्दलीय उम्मीदवार के तौर मैदान में उतरे। कहा जाता है कि ये चुनाव इंदिरा बनाम बहुगुणा का हो गया था। पर्वत पुत्र कहे जाने वाले बहुगुणा को हराने के लिए इंदिरा ने दर्जनों रैलियां की। अपनी सारी ताकत और मशीनरी झोंकने के बावजूद कांग्रेस बहुगुणा से चुनाव हार गई।

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