आधुनिक शिक्षा और रामचरितमानस के मूल्य
आईआईटी रूड़की में आठवें अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन का शुभारंभ हुआ, जहाँ शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि मानवता की सेवा से जोड़ने पर ज़ोर दिया गया। उद्घाटन सत्र में संस्थान के निदेशक के. के. पंत ने कहा कि रामचरितमानस के मूल्य आज की शिक्षा को नैतिक और सामाजिक रूप से सशक्त बना सकते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि आईआईटी रूड़की का कुलगीत भी “परहित सरिस धर्म नहिं भाई” की भावना से प्रेरित है, जो समाज के हित में जीवन समर्पण का संदेश देता है।
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👉 अभी ज्वाइन करें (Join Now)भारतीय ज्ञान परंपरा और युवाओं का दायित्व
निदेशक के. के. पंत ने भारतीय ज्ञान परंपरा को अमूल्य बताते हुए कहा कि माता-पिता के प्रति कर्तव्य, सामाजिक उत्तरदायित्व, सत्यनिष्ठा और रामराज्य जैसे आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे ज्ञान को उच्च वेतन तक सीमित न रखें, बल्कि विकसित भारत 2047 के निर्माण में अपना योगदान दें।
संतों का संदेश: आंतरिक सुख और चरित्र निर्माण
उद्घाटन सत्र में महामंडलेश्वर स्वामी हरिचेतनानंद का आशीर्वचन प्राप्त हुआ। उन्होंने मोबाइल और भौतिकता से घिरे वर्तमान युग में रामायण, महाभारत और शास्त्रों की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ये ग्रंथ चरित्र निर्माण, त्याग, भक्ति और सामाजिक समरसता का मार्ग दिखाते हैं।
ग्रंथ विमोचन और शोध को नई दिशा
सम्मेलन में “गीता शब्द अनुक्रमणिका” और सम्मेलन की ई-कार्यवाही का विमोचन किया गया। वक्ताओं ने इसे रामायण और गीता पर गंभीर अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं और साधकों के लिए उपयोगी बताया।
रामायण रत्न सम्मान और स्मृति व्याख्यान
उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति महावीर अग्रवाल को मरणोपरांत “रामायण रत्न” सम्मान दिया गया, जिसे उनकी धर्मपत्नी वीणा अग्रवाल ने ग्रहण किया। इसके साथ ही महावीर स्मृति व्याख्यान श्रृंखला का शुभारंभ हुआ, जिसमें रामायण की दार्शनिक परंपरा और शिक्षा में इसके संरचित अध्ययन की आवश्यकता पर विचार रखे गए।
विभिन्न श्रेणियों में सम्मान
सम्मेलन में शिक्षा, शोध और साहित्य के क्षेत्र में योगदान देने वाले विद्वानों को श्री रामचरित भवन रत्न, विभूषण और भूषण पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
वैश्विक सहभागिता और तीन दिवसीय आयोजन
आईआईटी रूड़की और श्री रामचरित भवन, अमेरिका द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस तीन दिवसीय सम्मेलन में भारत और विदेशों से विद्वान, संत और रामायण अध्येता भाग ले रहे हैं। आयोजकों के अनुसार लगभग 150 शोध पत्र प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जिन्हें समीक्षा के बाद ई-पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाएगा।
ज्ञान और भक्ति का संगम
सम्मेलन के वक्ताओं ने सामूहिक रूप से कहा कि रामायण को सततता, नैतिकता और समकालीन चुनौतियों से जोड़ने का यह प्रयास प्राचीन ज्ञान को आधुनिक संदर्भ में पुनर्परिभाषित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
