रुड़की, 24 सितंबर 2025। – आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने एक ऐतिहासिक और भौगोलिक अध्ययन में पाया है कि देशभर के प्रमुख शिव मंदिरों का स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि ये उच्च प्राकृतिक संसाधन उत्पादकता वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। यह अध्ययन अमृता विश्व विद्यापीठम (भारत) और उप्साला विश्वविद्यालय (स्वीडन) के सहयोग से किया गया, जिसने प्राचीन भारतीय सभ्यता और आधुनिक विज्ञान के बीच एक अनोखा पुल स्थापित किया।
सबसे पहले और सटीक खबरें पाने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें
👉 अभी ज्वाइन करें (Join Now)
शिव शक्ति अक्ष और प्राकृतिक संसाधन
शोध के अनुसार, केदारनाथ (उत्तराखंड) से लेकर रामेश्वरम (तमिलनाडु) तक आठ प्रतिष्ठित शिव मंदिर 79° पूर्वी देशांतर रेखा के साथ संरेखित हैं। इस रेखा को शोधकर्ताओं ने शिव शक्ति अक्ष रेखा (SSAR) नाम दिया। उपग्रह डेटा, पुरातात्विक साक्ष्यों और मंदिर भूगोल के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ कि ये मंदिर स्थल कृषि, जल, पवन और सौर ऊर्जा जैसे प्राकृतिक संसाधनों के उच्च उत्पादक क्षेत्रों में स्थित हैं।
प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संगम
मुख्य अन्वेषक प्रो. के.एस. काशीविश्वनाथन (WRDM विभाग, IIT रुड़की) ने कहा कि यह शोध दर्शाता है कि प्राचीन भारतीय समाज को प्राकृतिक संसाधनों और स्थायित्व की गहन समझ थी। यही ज्ञान मंदिर निर्माण और स्थान चयन में मार्गदर्शन का स्रोत रहा होगा।
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत ने कहा कि यह अध्ययन साबित करता है कि प्राचीन ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक विश्लेषण एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि पर्यावरण नियोजन के संकेतक
अध्ययन में यह भी बताया गया कि मंदिरों का चयन केवल आध्यात्मिक या धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि पंचतत्वों और संसाधन नियोजन के सांस्कृतिक संकेतों के आधार पर किया गया था। प्रमुख लेखक भाबेश दास के अनुसार, प्राचीन मंदिर निर्माता पर्यावरण योजनाकार भी थे, जिनके निर्णय भूमि, जल और ऊर्जा संसाधनों की गहरी समझ पर आधारित थे।
सह-अन्वेषक प्रो. थंगा राज चेलिया ने इसे एक अद्वितीय अंतःविषय सहयोग बताया, जो भारत की सांस्कृतिक विरासत और जलवायु लचीलेपन के बीच पुल का काम करता है।
अध्ययन का आधुनिक महत्व
शोध यह संकेत देता है कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर में गहन पर्यावरणीय अंतर्दृष्टि निहित है। यह ज्ञान आज के समय में सतत विकास और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का समाधान खोजने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यह खोज स्पष्ट रूप से बताती है कि प्राचीन भारतीय सभ्यता ने मंदिरों को केवल पूजा स्थलों के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्हें पर्यावरणीय और सामाजिक स्थिरता के केंद्र के रूप में स्थापित किया।
