नन्हें राधा-कृष्ण ने सजाई संस्कृति की झांकी — “मधुरम मधुरम फोटो कॉन्टेस्ट 2025” का परिणाम घोषित

राधा-कृष्ण की झांकी में सजे नन्हें स्वरूपों ने रविवार को देहरादून को भक्ति और संस्कृति की एक नई छवि दिखा दी। ऋषियों की अमरवाणी द्वारा आयोजित “मधुरम मधुरम – राधा कृष्ण फोटो कॉन्टेस्ट 2025” का शानदार समापन हुआ और विजेताओं की घोषणा के साथ ही यह आयोजन यादगार बन गया।

इस प्रतियोगिता में देशभर से 350 से अधिक प्रविष्टियां आईं। कहीं 7 महीने के बालक ने कन्हैया का रूप धारण किया, तो कहीं 2 महीने की बच्ची ने राधा बन सबका मन मोह लिया।

🏆 विजेताओं की सूची

बाल गोपाल श्रेणी

प्रथम स्थान: 7 माह के शिवार्थ जैन

द्वितीय स्थान: कृष जोशी

तृतीय स्थान: सव्य शर्मा

किशोरी जी श्रेणी

प्रथम स्थान: 2 माह की कृधा गुप्ता

द्वितीय स्थान: विदिशा नेगी

तृतीय स्थान: अद्रिका शर्मा

👩‍⚖️ जूरी की नज़र से

कार्यक्रम की जूरी में डॉ. अनुराधा शर्मा (प्रोफेसर ऑफ साइकोलॉजी), निमिषा शर्मा (HOD ऑफ इंग्लिश) और कृष्णा ओझा (इवेंट प्लानर) शामिल रहीं।

डॉ. अनुराधा शर्मा बोलीं — “इतनी छोटी आयु में बच्चों की मासूम भक्ति को मंच देना अभिभूत करने वाला अनुभव था। यह सिर्फ प्रतियोगिता नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक साधना थी।”

निमिषा शर्मा ने कहा — “यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि हमारी परंपराएं अब भी जीवित हैं और नई पीढ़ी उन्हें आत्मसात कर रही है।”

कृष्णा ओझा ने जोड़ा — “यह केवल कला का मंच नहीं बल्कि परिवारों को जोड़ने वाला आध्यात्मिक उत्सव है।

🌿 संस्था की नई पहलें

आयोजन के दौरान ऋषियों की अमरवाणी की प्रबंधन टीम ने आगे की योजनाओं की भी घोषणा की।

राजेन्द्र मोहन शर्मा (Editor-in-Chief): “यह आयोजन हमारी सनातन परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास है। आने वाले समय में और भी सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे।”

सरोज शर्मा (CEO): “अब हम केवल बच्चों तक सीमित नहीं रहेंगे। करवा चौथ पर माताओं को मंच देंगे, नवरात्रि पर गरबा प्रतियोगिता, मकर संक्रांति पर पतंगबाजी और होली पर विशेष आयोजन होंगे।”

सुमन शर्मा (COO): “हम पॉडकास्ट भी शुरू करने जा रहे हैं ताकि सनातन संस्कृति की गूंज हर घर तक पहुँचे। यह सिर्फ आयोजन नहीं बल्कि एक आंदोलन है।”

✨ संस्कृति का संदेश

“मधुरम मधुरम – राधा कृष्ण फोटो कॉन्टेस्ट 2025” ने दिखा दिया कि संस्कृति की डोर कितनी मज़बूत है। जब नन्हें बच्चे राधा-कृष्ण का रूप धारण कर मंच पर आते हैं तो यह केवल एक प्रतियोगिता नहीं रहती, बल्कि आस्था, कला और परिवार की एकता का पर्व बन जाती है।

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